कराची में पुलिस मुठभेड़ों में बढ़ती मौतों पर मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

Nov 9, 2026 - 00:30
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कराची में पुलिस मुठभेड़ों में बढ़ती मौतों पर मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

इस्लामाबाद, 08 नवंबर (हि.स.)। पाकिस्तान के कराची में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान संदिग्ध अपराधियों की मौत के मामलों में तेजी से हुई वृद्धि ने मानवाधिकार संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। संगठनों ने इन घटनाओं को कथित न्यायेतर हत्याएं बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। दूसरी ओर, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि सभी मुठभेड़ वास्तविक थीं और इस दौरान पुलिसकर्मियों को भी जान गंवानी पड़ी है।

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के अनुसार, कराची में पिछले 10 महीनों के दौरान पुलिस मुठभेड़ों में करीब 200 संदिग्ध सड़क अपराधी मारे गए। यह संख्या पिछले साल की समान अवधि में मारे गए 109 लोगों के मुकाबले लगभग 80 प्रतिशत अधिक है। कराची पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, एक जनवरी से 25 अक्टूबर 2026 के बीच 1,437 मुठभेड़ हुईं। इनमें 197 संदिग्धों की मौत हुई, जबकि 1,426 घायल हुए। मुठभेड़ों की संख्या भी 2025 की इसी अवधि के 840 के मुकाबले करीब 71 प्रतिशत बढ़ी है।

हालांकि, पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों में इन मुठभेड़ों के दौरान घायल हुए सुरक्षाकर्मियों की संख्या का ब्योरा नहीं दिया गया है। पुलिस का कहना है कि इन कार्रवाइयों में उसके जवानों को भी नुकसान उठाना पड़ा है।

मानवाधिकार आयोग पाकिस्तान (एचआरसीपी) के अध्यक्ष असद इकबाल बट ने मुठभेड़ों में संदिग्धों की मौत पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आयोग ऐसी मौतों को न्यायेतर हत्याएं मानता है। उनके मुताबिक, पंजाब पुलिस में कथित तौर पर पनपी मुठभेड़ों की यह प्रवृत्ति अब कराची तक पहुंचती दिखाई दे रही है।

बट ने बताया कि आयोग की तथ्य-जांच में पंजाब में आठ महीने के दौरान कथित पुलिस मुठभेड़ों में करीब 1,000 संदिग्धों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी। आयोग ने इसी वर्ष फरवरी में पंजाब के अपराध नियंत्रण विभाग (सीसीडी) पर सुनियोजित तरीके से फर्जी मुठभेड़ करने का आरोप लगाते हुए उसकी कार्रवाई की निंदा की थी।

एचआरसीपी ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर बताया था कि वर्ष 2025 में आठ महीनों के दौरान सीसीडी के नेतृत्व में कम से कम 670 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 924 संदिग्ध मारे गए। इस दौरान दो पुलिसकर्मियों की भी मौत हुई। आयोग के अनुसार, मौतों के आंकड़ों में भारी अंतर और विभिन्न जिलों में पुलिस कार्रवाई के एक जैसे तौर-तरीके किसी संस्थागत प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। उसने इन घटनाओं की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कराने की मांग की थी।

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