आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी ने जनजातीय गौरव पखवाड़े पर जनजातीय संस्कृति और सतत जीवन शैली को प्रदर्शित किया
आधुनिकता के बीच, जनजातीय संस्कृति की महत्ता को उजागर करने का प्रयास
कम शब्दों में कहें तो, आईसीएआर–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून ने भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में “जनजातीय गौरव पखवाड़ा” के अंतर्गत जनजातीय संस्कृति और सतत जीवन शैली का प्रदर्शनी का आयोजन किया। यह प्रयास जनजातीय समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जागरूक करने और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करने के लिए किया गया था।
भगवान बिरसा मुंडा: जनजातीय संस्कृति के प्रतीक
भगवान बिरसा मुंडा, जो कि भारत के झारखंड राज्य में जनजातीय समुदाय के एक महान नेता थे, उनकी जयंती मनाने का यह आयोजन केवल उनकी याद मनाने के लिए नहीं बल्कि जनजातीय लोगों की संस्कृति और उनके संघर्ष को भी दर्शाने वाला था। इसके माध्यम से समाज को यह समझाने का प्रयास किया गया कि जनजातीय संस्कृति केवल ऐतिहासिक महत्त्व की नहीं है, बल्कि यह आज के समय में भी अत्यधिक प्रासंगिक है।
संस्थान का योगदान और गतिविधियाँ
आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी ने इस विशेष पखवाड़े के अंतर्गत जनजातीय जीवनशैली, कला, और संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया। इनमें हस्तशिल्प, संगीत और नृत्य जैसी कई प्रस्तुतियाँ शामिल थीं जो जनजातीय समुदायों की विशिष्टता और उनके जीवंतता को दर्शाती हैं। ऐसी गतिविधियों का उद्देश्य स्थानीय लोगों और युवाओं के बीच जागरूकता बढ़ाना और इन्हें प्रोत्साहित करना था।
स्थायी जीवनशैली की अवधारणा
जनजातीय लोगों की जीवनशैली सततता पर जोर देती है। वे प्रकृति का सम्मान करते हैं और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहते हैं। इस प्रदर्शनी में आयोजित संवाद सत्रों में इस बात पर चर्चा की गई कि कैसे आधुनिकता के बदलावों के बीच इन मूल्यों का संरक्षण किया जा सकता है। पखवाड़े की गतिविधियाँ शहरी और ग्रामीण दोनों समुदायों में एक संवाद स्थापित करने का माध्यम बनीं।
समाज में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता
जनजातीय गौरव पखवाड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें यह अहसास कराता है कि हमारे समाज में विभिन्न संस्कृतियों की विभिन्नता है, जिसे हमें समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता है। यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ जनजातीय लोग अपनी कहानियाँ साझा कर सकते हैं और हम सभी मिलकर उनकी संस्कृति को एक नई पहचान दे सकते हैं।
निष्कर्ष
आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी के इस पखवाड़े का आयोजन न केवल भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को समर्पित था, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है कि हम सभी को विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए और उनके संरक्षण के लिए समर्पित रहना चाहिए। इस प्रकार के आयोजनों से जनजातीय संस्कृति को बढ़ावा मिलता है और युवा पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक किया जा सकता है।
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टीम यंग्सइंडिया, सुनिता शर्मा
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