रुद्रप्रयाग: जंगलों के बीच अकेली जी रही 70 वर्षीय बिमला देवी, सरकार से सहायता की आशा

Dec 25, 2025 - 16:30
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रुद्रप्रयाग: जंगलों के बीच अकेली जी रही 70 वर्षीय बिमला देवी, सरकार से सहायता की आशा
रुद्रप्रयाग: जंगलों के बीच अकेली जी रही 70 वर्षीय बिमला देवी, सरकार से सहायता की आशा

रुद्रप्रयाग: जंगलों के बीच बिमला देवी की करुण कहानी

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कम शब्दों में कहें तो, 70 वर्षीय बिमला देवी रुद्रप्रयाग के ढिंगनी गांव में अकेली जीवन यापन कर रही हैं, जहां सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की कमी के कारण ग्रामीण पलायन कर चुके हैं। बिमला देवी और अन्य गांववाले जंगली जानवरों की दहशत में जीने के लिए मजबूर हैं।

बिमला देवी की स्थिति

रुद्रप्रयाग के ढिंगनी गांव की 70 वर्षीय बिमला देवी का जीवन अब अकेलापन और असुरक्षा से भर गया है। जहां एक ओर गांव के अन्य लोग बेहतर जीवन की खोज में पलायन कर चुके हैं, वहीं बिमला देवी एक हिम्मती महिला के रूप में, अपने गांव की सांस्कृतिक धरोहर को अपने अंदर समेटे हुए हैं। उनके लिए यह जीवन रोज़ की चुनौतियों से भरा हुआ है।

गांव की बुनियादी सुविधाओं की कमी

ढिंगनी गांव में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। सड़कें टूटी-फटी हैं, स्वास्थ्य केंद्र नदारद हैं और शिक्षा के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है। जिसके कारण गांव के लोग मुंबई, दिल्ली और अन्य शहरी इलाकों की ओर पलायन करने पर मजबूर हो गए हैं। इतना कहने के बाद भी, बिमला देवी ने अपने गांव की मिट्टी में जुड़ी भावनाओं को छोड़ने का साहस नहीं किया है।

जंगली जानवरों का खतरा

बिमला देवी और बाकी गांववाले जंगली जानवरों के खौफ के साए में जीते हैं। जंगली जानवरों की गतिविधियों का उनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कभी-कभी ये जानवर उनके खेतों को नुकसान पहुंचाते हैं और कभी-कभी तो वे खुद जोखिम के जाल में फंस जाते हैं। इस स्थिति ने उनकी चिंता बढ़ा दी है और सुरक्षा के लिए सहायता की उम्मीद जगाई है।

सरकार से मदद की उम्मीद

बिमला देवी ने सरकार से मदद की अपील की है। उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी समस्याओं को समझे और उचित कदम उठाए, तो न केवल उनकी बल्कि पूरे गांव की स्थिति में सुधार हो सकता है। सरकार की ओर से उचित नीतियों और कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे गांव वालों को उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सके।

सभी के लिए एक संदेश

बिमला देवी की कहानी केवल एक महिला की नहीं है, बल्कि यह उन सभी गांववालों की है जो आज भी जंगली जानवरों और सुविधाओं की कमी के बीच जी रहे हैं। हमें चाहिए कि हम इस आवाज़ को सुनें और उनके लिए संघर्ष करें। यही हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

अंत में, यह समय है कि हमारी सरकार ऐसे लोगों की मजबूरी और कठिनाइयों को समझे और उनकी सहायता करे। केवल सरकारी प्रयासों से ही वे दिन देखने की उम्मीद कर सकते हैं जब उन्हें जीने के लिए चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

इस कहानी में और अधिक जानने के लिए, कृपया यहां क्लिक करें.

टीम यंग्सइंडिया, दीप्ति शर्मा

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